कोलकाता से करीब 80 किलोमीटर दूर हावड़ा जिले के एक दूरदराज के गांव में लालचंद जी रहते हैं। उनका गांव घोराबेरिया-चितानान ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है, जो भातोरा ग्राम पंचायत के पड़ोसी हैं। दोनो पंचायते तीन नदियों मुंडेसवारी, दमदोर और रूपानारायण से घिरी हुई हैं 

जब भी नदी में कम ज्वार आता तो लोगो को  घुटने से गहरे घास और कीचड़ में से नदी को पार करना पड़ता था क्योंकि ऐसे समय में नौकाओं का संचालन नहीं हो सकता था। स्कूली छात्र और गर्भवती महिलाओं इससे सबसे ज्यादा पीड़ित थी , कुछ गर्भवती महिलाओं की समय पर अस्पताल तक न पहुंच पाने के कारन मृत्यु भी हुई। 

अपने गांव के लोगों की दयनीय स्थिति और सरकार की उदासीनता को देखते हुए, लालचंद ने खुद ही कुछ करने का फैसला किया।

जब उन्होंने पहली बार सितंबर 2014 में गांव की चौपाल  में पुल का निर्माण करने का अपना विचार साझा किया, तो ग्रामीणों ने उनका खूब मजाक उड़ाया और बोले -एक आदमी, जो सिर्फ दिन के 400 रूपये कमाता है वो उस पुल को बनाने की बात कर रहा है जिसको सरकार भी नहीं बना पायी।

बहुत विनतियो के बाद, अंत में  ग्राम पंचायत ने इस शर्त पर पुल का निर्माण करने की अनुमति प्राप्त की की इसमें आने वाला सारा खर्च वह खुद अपनी जेब से लगाएगा।

फिर पैसे के लिए संघर्ष शुरू हुआ लालचंद कहते हैं, “सबसे बड़ी बाधा धन की व्यवस्था कर रही ।” उसने अपनी पत्नी के आभूषणों को 3 लाख रूपये में बेच दिया, और अपने दोस्तों से 4 लाख रुपए उधार लिए। वे कहते हैं, “मेरे भाइयों और बहनों की तरह हजारों ग्रामीणों की कठिनाई को कम करने के अलावा कुछ भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था”।

आख़िरकार नवंबर 2014 में  उन्होंने कुशल कारीगरों की मदद से 600 मीटर लंबे और 2.20 मीटर चौड़े  पुल का निर्माण करवाया।

लालचंद ने 1.5 लाख रूपए के वार्षिक भुगतान पर ग्राम पंचायत से लीज पर पुल लगाया ताकि वह 7.5 लाख रूपए की कमाई कर सके जो उसने अपनी जेब से लगाई है। पुल की सुरक्षा की निगरानी और चार निगरानी कैमरे के निरीक्षण और रखरखाव के लिए छह व्यक्तियों को चौबीस घंटे काम पर रखा गया है।

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