Monday, September 24, 2018

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दशरथ मांझी

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” माउंटेन मैन” दशरथ मांझी

दशरथ मांझी जो बिहार में गया के करीब गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे। उन्होनें केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों के परीश्रम के बाद, दशरथ की बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया।

 

दशरथ मांझी काफी कम उम्र में अपने घर से भाग गए थे और धनबाद की कोयले की खानों में उन्होनें काम किया। फिर वे अपने घर लौट आए और फाल्गुनी देवी / Falguni Devi से शादी की। अपने पति के लिए खाना ले जाते समय उनकी पत्नी फाल्गुनी पहाड़ के दर्रे में गिर गयी और उनका निधन हो गया। अगर फाल्गुनी देवी को अस्पताल ले जाया गया होता तो शायद वो बच जाती यह बात उनके मन में घर कर गई। इसके बाद दशरथ मांझी ने संकल्प लिया कि वह अकेले अपने दम पर वे पहाड़ के बीचों बीच से रास्ता निकालेगे और फिर उन्होंने 360 फ़ुट-लम्बा (110 मी), 25 फ़ुट-गहरा (7.6 मी) 30 फ़ुट-चौड़ा (9.1 मी)गेहलौर की पहाड़ियों से रास्ता बनाना शुरू किया। इन्होंने बताया, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा लेकिन इस बात ने मेरे निश्चय को और भी मजबूत किया। ”

उन्होंने अपने काम को 22 वर्षों (1960-1982) में पूरा किया। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दिया। माँझी के प्रयास का मज़ाक उड़ाया गया पर उनके इस प्रयास ने गेहलौर के लोगों के जीवन को सरल बना दिया। हालांकि उन्होंने एक सुरक्षित पहाड़ को काटा, जो भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम अनुसार दंडनीय है फिर भी उनका ये प्रयास सराहनीय है। बाद में मांझी ने कहा,” पहले-पहले गाँव वालों ने मुझपर ताने कसे लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे खाना दीया और औज़ार खरीदने में मेरी सहायता भी की।”

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) के कैंसर से पीड़ित मांझी का 73 साल की उम्र में, 17 अगस्त 2007 को निधन हो गया। बिहार की राज्य सरकार के द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया।

मांझी ‘माउंटेन मैन’ / Manjhi The Mountain Man के रूप में विख्यात हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव रखा।

सबसे बड़ा दानवीर

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सबसे बड़ा दानवीर – पालम कल्याणसुन्दरम

Tirunelveli के रहने वाले पालम कल्याणसुन्दरम तो ना जाने किस मिट्टी के बने हैं, उन्होंने लगातार तीस साल तक, हर महीने मिलने वाली अपनी पूरी सैलरी दान में दे दी…जी हाँ पूरी की पूरी सैलरी!

आइये आज हम उस महान सख्श की कहानी जानते हैं-

  • जो शायद दुनिया का पहला और अकेला इंसान है जिसने अपनी सारी कमाई दान में दे दी
  • जिसे सुपर स्टार रजनीकांत अपने पिता के रूप में अडॉप्ट कर चुके हैं
  • जिसे यूनाइटेड नेशंस ने 20th century के outstanding लोगों में शुमार किया है
  • जिसे अमेरिका की एक संस्था, “Man of the Milennuim” award दे चुकी है
  • जिससे अमेरिका के भूतपूर्व राष्टपति Mr. Bill Clinton, अपनी भारत यात्रा के दौरान मिलना चाहते थे
  • जिसे भारत सरकार ने “Best Librarian of India” माना है, और
  • जिसे `The International Biographical Centre, Cambridge ने ‘one of the noblest of the world’ का सम्मान दिया है

 

स्कूल की पढाई ख़त्म हो जाने के बाद, कल्याणसुन्दरम जी ने तमिल विषय में BA degree लेने का निश्चय किया। लेकिन चूँकि इस subject को opt करने वाले वो अकेले व्यक्ति थे इसलिए St. Xavier’s College के मैनेजमेंट ने उन्हें कोई और सब्जेक्ट लेकर पढने को कहा, लेकिन उन्होंने मन कर दिया।

जब MTT Hindu College के फाउंडर Karumuttu Thygaraja Chettiar को ये पता चला तो उन्होंने ना सिर्फ उन्हें उनके पसंदीदा कोर्स में एडमिशन दिया बल्कि उनकी पढाई का खर्च भी उठा लिया।

 

BA करने के बाद कल्याणसुन्दरम जी ने साहित्य और इतिहास में MA degree हासिल की और लाइब्रेरी साइंस की भी पढाई पूरी की, जिसमे वे गोल्ड मेडलिस्ट रहे। शायद आपको जानकार आश्चर्य हो की पालम कल्याणसुन्दरम जी दुनिया के 10 सबसे अच्छे लाइब्रेरियन में भी गिने जाते हैं

 

गरीब, अनाथ, बेसहारा बच्चों की पीड़ा देख कर कल्याणसुन्दरम जी का ह्रदय पिघल उठता था, इसलिए उन्होंने पढाई करते समय ही ऐसे बच्चों की मदद करने के लिए International Children’s Welfare Organisation नाम से एक संस्था बनायी। इसके बारे में अभी कोई जानकारी नहीं मिली, संभवतः यह संस्था कुछ समय बाद बंद हो गयी। हालांकि, उनका ऐसा करना दर्शाता है कि मानवता की सेवा के बीज उनके अन्दर शुरू से ही थे।

1962 में कल्याणसुन्दरम जी मद्रास यूनिवर्सिटी से Library Science की शिक्षा ले रहे थे। उसी दौरान भारत-चीन युद्ध भी अपने चरम पे था। तभी कल्याणसुन्दरम जी ने रेडियो पर पंडित जवाहरलाल नेहरु का सन्देश सुना जिसमे इ देशवासियों से डिफेंस फण्ड में अपना योगदान देने की अपील कर रहे थे।

कल्याणसुन्दरम जी के इस काम की लोकल न्यूज़ पेपर्स में काफी प्रसंशा हुई और खुद मुख्य मंत्री उनके इस कदम से इतने प्रभावित हुए की 1963 में May Day के दिन उन्हें सम्मानित किया।

कल्याणसुन्दरम जी चाहते थे कि उनकी गोल्ड चेन डोनेट करने की बात उस समय की पॉपुलर मैगज़ीन आनंद विकाटन में छपे, ताकि और लोग भी प्रेरित हो डिफेंस फण्ड में अपन योगदान दें। लेकिन मैगज़ीन के एडिटर एस. बाला सुब्रमणियन ने इसे एक पब्लिसिटी स्टंट समझा और कल्याणसुन्दरम जी को अगले पांच साल में अपनी sincerity साबित करने को कहा।

पढाई के बाद उनकी नौकरी Kumarkurupara Arts College at Srivaikuntam, में बतौर लाइब्रेरियन लग गयी, जहाँ उन्होंने 35 साल तक काम किया। शुरू के कुछ सालों में वो अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा ही दान में देते थे लेकिन जल्द ही वे अपनी पूरी कमाई ही दान में देने लगे और अपना खर्चा चलाने के लिए छोटे-मोटे काम करने लगे।

पालम कल्याणसुन्दरम कहते हैं, “ये समझने के लिए की गरीब होना कैसा होता है मैं फुटपाथों  पे और रेलवे प्लेटफार्मस पर  सोया हूँ, सर पर बिना किसी छत के।”

कई बार कल्याणसुन्दरम जी को ऐसा करते उनके स्टूडेंट्स देख लेते और बाद में उनसे आ कर  कहते की हमने आज प्लेटफार्म पर आपके एक डुप्लीकेट देखा…बिलकुल आपकी तरह! और कल्याणसुन्दरम जी ये सुनकर मुस्कुरा देते।

उनका कहना है,  “मैं एक बैचलर हूँ और मेरी पर्सनल ज़रूरतें बहुत कम हैं। मैं होटल और लांड्री वगैरह में छोटे-मोटे काम करके अपना खर्चा चला लेता हूँ। मैं…बस किसी चीज पर अपना अधिकार नहीं चाहता। Actually, मेरे जीवन का सबसे सुखद पलों में से एक वो पल था जब मुझे एक अमेरिकी आर्गेनाइजेशन ने “Man of the Millennium” चुना और मैंने इनाम में मिले 30 करोड़ रुपये चैरिटी में दे दिए। इसलिए, सबकुछ एक state of mind है। अंत में जब हम दुनिया छोड़ कर जाते हैं तो अपने साथ क्या ले जाते हैं?”

कल्याणसुन्दरम जी का मानना है कि हर किसी को अपने चुने हुए क्षेत्र में कुह अचीव करना चाहिए। लाइब्रेरी साइंस में उनका बहुत बड़ा योगदान है। लाइब्रेरी में किस प्रकार किताबों को ट्रेस और एक्सेस किया जाए, इसके लिए उहोने एक सरल तरीका इजात किया है। काम के प्रति उनकी लगन की वजह से वे इस क्षेत्र में भी बड़े सम्मान प्रपात कर चुके हैं।

70 से अधिक उम्र का होने के बावजूद कल्याणसुन्दरम जी को बच्चे और युवाओं के साथ घनिष्टता बनाने में समय नहीं लगता। वो एक घटना बताते हैं जब उन्होंने खादी पहनना शुरू किया।

कल्याणसुन्दरम जी चुपचाप अपना काम किये जा रहे थे और उन्होंने कभी इस बात को हाईलाइट करने की कोशिश नहींकी। जब 1990 में उन्हें UGC से बतौर arrear 1 लाख रुपया मिला तो हमेशा की तरह  उन्होंने उसे भी दान करने का निश्चय किया। वे District Collector के पास गए और अनाथ बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए ये पैसे charity में दे दिए।

उनके ना चाहते हुए भी कलेक्टर ने ये बात मीडिया को बता दी और इस माहन आदमी की कहानी पूरी दुनिया के सामने आ गयी। जिसके बाद उन्हें देश-विदेश हर जगह से सम्मानित किये जाने का सिलसिला शुरू हो गया।

जब सुपरस्टार रजनीकांत, जो खुद बहुत से सामजिक कार्य किया करते हैं, को उनके बारे में पता चला तो उनका माथा भी इस व्यक्ति के सम्मान में झुक गया और उन्होंने कल्याणसुन्दरम को अपने पिता के रूप में adopt कर लिया।

रजनीकांत उन्हें अपने घर ले जाकर साथ रखना चाहते थे, पर कल्याणसुन्दरम जी तो अपने छोटे से कमरे में ही खुश थे और उन्होंने उनका ये आग्रह अस्वीकार कर दिया।

कल्याणसुन्दरम जी जब तक नौकरी में रहे वे मुख्यतः बच्चों के वेलफेयर के लिए काम करते रहे। लेकिन 1998 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने और लोगों की भी सेवा करने का सोचा और इस तरह उनकी संस्था पालम का जन्म हुआ।

कल्याणसुन्दरम जी ने पालम बनाने के बाद जो सबसे पहला काम किया वो था उन्हें रिटायरमेंट पर मिलने वाला 10 लाख रुपया समाज सेवा में लगाना। उन्होंने ये सारा पैसा Collector’s Fund में जमा करा दिया और वो आज भी हर महीने वाली पेंशन भी समाज सेवा में लगा देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे अपनी पैत्रिक संपत्ति भी दान में दे चुके हैं।

आज उनकी संस्था donors और beneficiaries के बीच में एक लिंक का काम करती है और बच्चों की शिक्षा, बीमार लोगों का ईलाज, विकलांग लोगों की मदद और किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से प्रभावित हुए लोगों को रिलीफ पहुंचाने में  अग्रसर है ।

कल्याणसुन्दरम जी पैसों से बिलकुल भी आकर्षित नहीं होते। उनका कहना है, “ कोई व्यक्ति तीन तरह से पैसे पा सकता है। पहला, खुद कमा के, दूसरा पेरेंट्स की कमाई से और तीसरा किसी से दान में पैसे पाकर। लेकिन अपने कमाए पैसों को डोनेट करने से ज्यादा सुखद और संतोषजनक कुछ भी नहीं है।”

 

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पत्नी के गहने बेचकर बच्चो के स्कूल जाने के लिए पुलिया बनाया

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कोलकाता से करीब 80 किलोमीटर दूर हावड़ा जिले के एक दूरदराज के गांव में लालचंद जी रहते हैं। उनका गांव घोराबेरिया-चितानान ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है, जो भातोरा ग्राम पंचायत के पड़ोसी हैं। दोनो पंचायते तीन नदियों मुंडेसवारी, दमदोर और रूपानारायण से घिरी हुई हैं 

जब भी नदी में कम ज्वार आता तो लोगो को  घुटने से गहरे घास और कीचड़ में से नदी को पार करना पड़ता था क्योंकि ऐसे समय में नौकाओं का संचालन नहीं हो सकता था। स्कूली छात्र और गर्भवती महिलाओं इससे सबसे ज्यादा पीड़ित थी , कुछ गर्भवती महिलाओं की समय पर अस्पताल तक न पहुंच पाने के कारन मृत्यु भी हुई। 

अपने गांव के लोगों की दयनीय स्थिति और सरकार की उदासीनता को देखते हुए, लालचंद ने खुद ही कुछ करने का फैसला किया।

जब उन्होंने पहली बार सितंबर 2014 में गांव की चौपाल  में पुल का निर्माण करने का अपना विचार साझा किया, तो ग्रामीणों ने उनका खूब मजाक उड़ाया और बोले -एक आदमी, जो सिर्फ दिन के 400 रूपये कमाता है वो उस पुल को बनाने की बात कर रहा है जिसको सरकार भी नहीं बना पायी।

बहुत विनतियो के बाद, अंत में  ग्राम पंचायत ने इस शर्त पर पुल का निर्माण करने की अनुमति प्राप्त की की इसमें आने वाला सारा खर्च वह खुद अपनी जेब से लगाएगा।

फिर पैसे के लिए संघर्ष शुरू हुआ लालचंद कहते हैं, “सबसे बड़ी बाधा धन की व्यवस्था कर रही ।” उसने अपनी पत्नी के आभूषणों को 3 लाख रूपये में बेच दिया, और अपने दोस्तों से 4 लाख रुपए उधार लिए। वे कहते हैं, “मेरे भाइयों और बहनों की तरह हजारों ग्रामीणों की कठिनाई को कम करने के अलावा कुछ भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था”।

आख़िरकार नवंबर 2014 में  उन्होंने कुशल कारीगरों की मदद से 600 मीटर लंबे और 2.20 मीटर चौड़े  पुल का निर्माण करवाया।

लालचंद ने 1.5 लाख रूपए के वार्षिक भुगतान पर ग्राम पंचायत से लीज पर पुल लगाया ताकि वह 7.5 लाख रूपए की कमाई कर सके जो उसने अपनी जेब से लगाई है। पुल की सुरक्षा की निगरानी और चार निगरानी कैमरे के निरीक्षण और रखरखाव के लिए छह व्यक्तियों को चौबीस घंटे काम पर रखा गया है।

हरकचंद सावला

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करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था।

युवक वहां अस्पताल की सीढिय़ों पर मौत के द्वार पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था,

जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था।

इन रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे।

थोड़ी देर में ही यह दृष्य युवक को परेशान करने लगा।

वहां मौजूद रोगियों में से अधिकांश दूर दराज के गांवों के थे, जिन्हे यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिले? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे।

टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से घर लौट आया।

उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूंगा। कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा..

उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देक्रर कुछ पैसा उठाया। उसने इन पैसों से ठीक टाटा कैंसर अस्पताल के सामने एक भवन लेकर धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरू कर दिया।

उसकी यह गतिविधि अब 27 साल पूरे कर चुकी है और नित रोज प्रगति कर रही है। उक्त चेरिटेबिल संस्था कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है।

करीब पचास लोगों से शुरू किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रूका।

यह पुनीत काम करने वाले युवक का नाम था हरकचंद सावला।

एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला जरूरतमंदों को निशुल्क दवा की आपूर्ति शुरू कर दिए।

इसके लिए उन्होंने मैडीसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट स्वैच्छिक सेवा देते हैं। इतना ही नहीं कैंसर पीडि़त बच्चों के लिए खिलौनों का एक बैंक भी खोल दिया गया है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि सावला द्वारा कैंसर पीडि़तों के लिए स्थापित ‘जीवन ज्योत ट्रस्ट ‘ आज 60 से अधिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।

57 साल की उम्र में भी सावला के उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है।

मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है।

यह विडंबना ही है कि आज लोग 20 साल में 200 टेस्ट मैच खेलने वाले सचिन को कुछ शतक और तीस हजार रन बनाने के लिए भगवान के रूप में देखते हैं।

जबकि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले को कोई जानता तक नहीं।

यहां मीडिया की भी भूमिका पर सवाल है, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करती है।

यहां यह भी बता दे कि गूगल के पास सावला की एक तस्वीर तक नहीं है।

यह हमे समझना होगा कि पंढरपुर, शिरडी में साई मंदिर, तिरुपति बाला जी आदि स्थानों पर लाखों रुपये दान करने से भगवान नहीं मिलेगा।

भगवान हमारे आसपास ही रहता है। लेकिन हम बापू, महाराज या बाबा के रूप में विभिन्न स्टाइल देव पुरुष के पीछे पागलों की तरह चल रहे हैं।

इसके बाजवूद जीवन में कठिनाइयां कम नहीं हो रही हैं और मृत्यु तक यह बनी रहेगी।

परतुं बीते 27 साल से कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को हरकचंद सावला के रूप में भगवान ही मिल गया है।

लाखों की नौकरी छोड़ कर रहा गरीबो की सेवा

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मदुरै के नारायण कृष्णन एक अवार्ड विनिंग शेफ हैं जो फाइव स्टार होटल में मोटी सैलरी पर काम किया करते थे. लेकिन एक दिन उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आया कि उन्होंने अपनी लाखों की नौकरी छोड़ दी और गरीबों की मदद करने में जुट गया.

नारायणन के मुताबिक वो साल 2002 में मदुरै शहर के एक मंदिर में गए थे, जहां उनकी नजर एक ऐसे बुजुर्ग शख्स पर पड़ी जो दयनीय हालत में पुल के नीचे बैठा था और कूड़े में खाना ढूंढ रहा था. इस नजारे को देखकर नारायणन को बड़ा झटका लगा और महज एक हफ्ते में नौकरी छोड़कर वो वापस घर लौट आए.

नारायणन को अपनी इस मुहिम के लिए एक वैन दान में मिली है जो हर रोज 125 मील का सफर तय करती है और करीब 400 लोगों को खाना खिलाया जाता है. नारायणन खुद अपने हाथों से इन लोगों के लिए खाना बनाते हैं. इतना ही नहीं अगर भूखा शख्स ज्यादा कमजोर हो तो उसे वो अपने हाथ से खाना भी खिलाते हैं.

इस काम के लिए नारायणन को हर रोज करीब 15 हजार रुपये की जरूरत होती है. जबकि उनके पास जो दान में रकम आती है उससे केवल 22 दिन का ही खर्च चल पाता है.

इस मुहिम को चलाने के लिए नारायणन को पैसों की कमी का सामना करना पड़ता है लेकिन अपनी नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें गरीबों को हर रोज अपने हाथ से बना खाना खिलाने में बड़ा मज़ा आता है

 

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5 रुपये में देसी घी का भरपेट खाना

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5 रुपये में देसी घी का खाना

नोएडा के सेक्टर 29 में,  आप केवल 5 रुपये देकर देसी घी में बनाये  गये  दाल  चावल, सब्जी और रोटी की एक प्लेट पा सकते हैं। नोएडा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, अनूप खन्ना ने कुछ लोगो के साथ ‘दादी की रसोई’ शुरू की है, जिसका लक्ष्य कम से कम से कम पैसो में भोजन प्रदान करना है।

गरीब लोगों को खाना खिलाने के बारे में यह विचार अनूप खन्ना की मां के दिमाग  में आया और उन्होंने सोचा कि क्यों न गरीब लोगों को रोजाना खाना खिलाया जाये.  कुछ साल पहले.तक, घर पर 15-20 गरीब लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता था. इसके बाद कुछ करीबी दुकानदारों ने खन्ना जी को सहयोग दिया और उन्हें जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद दादी की रसोई/ Dadi Ki Rasoi की शुरुआत हुई.

 

इसके उद्घाटन के करीब एक महीने बाद, ही ‘दादी की रसोइ’/ Dadi Ki Rasoi  शहर में काफी फेमस हो गई । दोपहर के भोजन के लिए स्टाल में चाहे रिक्शे वाले हो, दुकान के मालिक या एक यात्री, सभी लोग उत्साह के साथ आने लगे.। रोजाना दो घंटे के लिए, दोपहर 12 से 2 के बीच, ‘दादी कि रसोई’/ Dadi Ki Rasoi में 400 से ज्यादा लोग  खाने के लिए आने लगे.

आस पास के निवासियों के समर्थन ने उनको  प्रोत्साहित किया. कई लोगों ने पहल की और  दान करने के लिए आगे आये ।

खन्ना अब अपनी पूरी जिन्दगी यह पहल जारी रखना चाहते है और दूसरी जगहों में भी ऐसे स्टालों  को स्थापित करने के लिए अधिक से अधिक लोगो को प्रोत्साहित करते हैं।

 

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6 घंटे में अकेले बचाई थी 65 मजदूरों की जान

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6 घंटे में अकेले बचाई थी 65 मजदूरों की जान

ये है  1989 में कोयले की खदान में फंसे 65 लोगों को जिंदा निकालने वाले अमृतसर के इंजीनियर जसवंत सिंह गिल । यह हादसा अब तक के कोयला खदानों में हुए सबसे बड़े हादसों में से एक था। 13 नवंबर 1989 को रानीगंज के महाबीर खदान (वेस्ट बंगाल) में कोयले से बनी चट्टानों को ब्लास्ट कर तोड़े जाने के दौरान वाटर टेबल की दीवार में क्रैक आ गया और पानी तेजी से इन दरारों से बहने लगा।

एक करोड़ पौधे लगाने वाले

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रमैया दरिपल्‍ली, तेलंगाना के खमाम जिले के रेड्डीपल्‍ली गांव के रहने वाले हैं. रमैया अब तक एक करोड़ से अधिक पौधे लगा चुके हैं और अब भी लगाते ही जा रहे हैं. पेड़-पौधे उनकी जिंदगी हैं पर कभी ये जुनून उनके लिए परेशानी का सबब बन गया था. एक समय ऐसा भी था जब लोगों ने उन्‍हें ‘पागल’ कहना शुरू कर दिया था. आज वही लोग उनका गुणगान करते नहीं थक रहे.

रमैया केवल दसवीं कक्षा तक ही पढ़े हैं. पर अगर उन्‍हें पौधों से सबंधित कोई भी किताब मिल जाए तो उसे पूरा पढ़ते हैं. बता दें कि उन्‍हें एकेडमी ऑफ यूनिव‍र्सल ग्‍लोबल पीस ने डॉक्‍टरेट की उपाधि दी है. उनके इलाके में उन्हें ‘Tree Man’ के नाम से भी जाना जाता है.

 

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सूरत  के हीरा व्यापाराी महेश सावणी

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सूरत  के एक हीरा व्यापाराी महेश सावणी ने 251 गरीब लड़कियों की शादी का जिम्मा उठाया। इनमें से 5 मुस्लिम और 1 ईसाई जोड़ा भी शामिल था। दो ऐसी लड़किंयां भी थीं जो एचआईवी की बीमारी से जूझ रही हैं।

हीरे का व्यापार करने वाले महेश सावणी ने अपने खर्च पर यह समारोह आयोजित करवाया। उन्होंने कहा कि गरीबों की शादी करवाना भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने जैसा है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। सावणी 2012 से ही समय-समय पर गरीब लड़कियों की शादी का जिम्मा उठाते चले आ रहे हैं। वे लगभग 500 गरीब और अनाथ लड़कियों का पूरा खर्च उठाते हैं और बड़ी होने पर उनकी शादी भी करवाते हैं। इस मौके पर सावणी ने इन सभी लड़कियों के पिता का दायित्व निभाया और कन्यादान किया।

सूरत शहर में एक भव्य माहौल में रंग बिरंगे कपड़ों में सजी दुल्हनों ने हजारों लोगों के सामने शादी के फेरे लिए और रस्में निभाई गईं। सूरत को डायमंड पॉलिशिंग का हब माना जाता है। इसके पहले के आयोजनों में सावणी ने दुल्हनों को सोफा, बेड, गहने और 5 लाख रुपये नकद भी दिए थे, ताकि वे अपने नए जीवन की शुरुआत कर सकें। इन नए दंपतियों के पास गहने, घर का सामान या फर्नीचर में से एक विकल्प चुनने का मौका था। सूरत के मोटा वरच्छा इलाके में स्वामी चैतन्य विद्या संकुल में इस भव्य समारोह का आयोजन किया गया था।

सावणी अब तक लगभग 900 लड़कियों की शादी कर चुके हैं उससे पहले उन्होंने 1,300 लड़कियों की शादी में मदद की थी। इस मौके पर समाजसेवियों और धार्मिक गुरुओं को भी आमंत्रित किया गया था। महेश सावणी अक्सर दूसरों की मदद करने के लिए सुर्खियों में रहते हैं। इससे पहले उन्होंने उड़ी हमले में शहीद सैनिकों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने की घोषणा की थी। उन्होंने अपने गांव की कई लड़कियों को गोद ले रखा है और वे उनकी देखभाल करते रहते हैं। भारत में शादी एक काफी मंहगा खर्च माना जाता है जिसमें लाखों रुपयों के दहेज का लेन-देन भी होता है। ऐसे सामूहिक आयोजन दहेज विरोधी अभियान को भी चुनौती देते हैं।

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